Child phycology for tet, ctet, KVS-, NVS, TGT, PGT, STET, DSSSB and other state teachers' vacancy exam preparation notes.
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Wednesday, August 28, 2019
बाल मनोविज्ञान के अति महत्वपूर्ण प्रश्न for tet,ctet 2019
प्रश्न 1– किस अवस्था मे बच्चे अपने समवयस्क समूह के सक्रिय सदस्य हो जाते है।
प्रश्न 2– बच्चे के संज्ञानात्मक विकास को सबसे अच्छे तरीके से कहॉ परिभाषित किया जा सकता है।
प्रश्न 3– पियाजे के अनुसार बौद्धिक विकास का निर्धारक तत्व नही है।
प्रश्न 4– बालकों की सोच अमूर्तता की अपेक्षा मूर्त अनुभवों एवं प्रत्ययों से होती है। यह अवस्था है।
प्रश्न 5 – संवेदी पेशीय अवस्था होती है।
प्रश्न 6 – एक 13 वर्षीय बालक बात-बात में अपने बड़ों से झगड़ा करने लगता है और हमेशा स्वयं को सही साबित करने की कोशिश करता है वह विकास की कौन सी अवस्था है।
प्रश्न 7 – ‘खिलौनों की आयु कहा जाता है।‘
प्रश्न 8 – उत्तर बाल्यावस्था में बालक भौतिक वस्तुओं के किस आवश्यक तत्व में परिवर्तन समझने लगता है।
प्रश्न 9 – दूसरे वर्ष के अंत तक शिशु का शब्द भंडार हो जाता है।
प्रश्न 10 – शर्म तथा गर्व जैसी भावना का विकास किस अवस्था में होता है।
प्रश्न 11 – मैक्डूगल के अनुसार मूल प्रवृति ‘जिज्ञासा’ का संबंध कौन संवेग से है।
प्रश्न 12 – शैशवावस्था की मुख्य विशेषता नही है।
प्रश्न 13 – किसी विद्यार्थी कह सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
प्रश्न 14 – मानवीय मूल्यों, जो प्रकृति में सार्वत्रिक हैं, के विकास का अर्थ है-
प्रश्न 15 – किस स्तर के बच्चे अपने समकक्षी वर्ग के सक्रिय सदस्य बन जाते है।
प्रश्न 16– विकास शुरू होता है।
प्रश्न 17 – बहुविध बुद्धि सिद्धांत के अनुसार सभी प्रकार के पशुओं, खनिजों और पेड़-पौधों को पहचाने और वर्गीकृत करने की योग्यता .................. कहलाती है।
प्रश्न 18–पियाजे के अधिगम के संज्ञानात्मक सिद्धांत के अनुसार, वह प्रक्रिया जिसके द्वारा संज्ञानात्मक संरचना को संशोधित किया जाता है ................. कहलाती है।
प्रश्न 19 – कोहलबर्ग के अनुसार सही और गलत प्रश्नों के बारे में निर्णय लेने में शामिल चिंतन प्रक्रिया को कहा जाता है।
प्रश्न 20– एक व्यक्ति अपने समकक्ष व्यक्तियों के समूह के प्रति आक्रामक व्यवहार करता है और विद्यालय के मानदंडों को नही मानता। इस विद्यार्थी को ..................... में सहायता की आवश्यकता है।
प्रश्न 21– शिक्षक को यह सलाह दी जाती है कि वे उपने शिक्षार्थियों को सामूहिक गतिविधियों में शामिल करें, क्योंकि सीखने को सुगम बनाने के अतिरिक्त, ये.................... में भी सहायता करती है।
प्रश्न 22– ब्रूनर किस समप्रदाय के समर्थक थे।
प्रश्न 23 – कौन सा सिद्धान्त जीव विधि के हर क्ष्ोत्र पर बल देता है।
प्रश्न24 – गेस्टाल्ट का अर्थ क्या है।
प्रश्न 25– प्रतिस्थापन का सिद्धान्त किस वैज्ञानिक ने दिया।
प्रश्न 26 – स्वसिद्धान्त किसने दिया ।
प्रश्न 27–आवश्यकता का पद सोपान सिद्धान्त किसने दिया।
प्रश्न 28– अधिगम का अर्थ क्या है ।
प्रश्न 29– अधिगम से क्या तात्पर्य है।
प्रश्न 30 – अधिगम पूर्ण कब होगा।
प्रश्न 31 – संज्ञान किसे कहते है।
प्रश्न32 – व्यवहारवादी मनोविज्ञान के जनक कौन है।
प्रश्न 33 – मनोविज्ञान के जनक कौन है।
प्रश्न 34– मनोविशलेषणात्मक मनोविज्ञान के जनक कौन है।
प्रश्न 35 – अंधो की लिपि के जनक कौन है
प्रश्न 36 – L . K . G व U . K . G पद्धति के जनक कौन है।
प्रश्न 37 – नर्सरी पद्धति के जनक कौन है।
प्रश्न 38– भूल एवं प्रयत्न सिद्धान्त किसने दिया।
प्रश्न 39- अनुकूलित अनुक्रिया या क्लासिकी अुनबन्ध सिद्धान्त किसने दिया ।
प्रश्न 40 – क्रिया प्रसूत अनुबन्ध सिद्धान्त किसने दिया ।
प्रश्न 45– जीनप्याजे किस विचारधारा के समर्थक थे।
प्रश्न 46 – जीनप्याजे किस देश के निवासी थे।
प्रश्न 47 – जीनप्याजे ने अपने प्रयोग किस-किस पर किये।
प्रश्न 48 – वह कौन मनोवैज्ञानिक है जो पहले जीवविज्ञान के प्रोफेसर थे बाद मे मनोविज्ञान के प्रोफेसर बने ।
प्रश्न 49 – स्कीमा सिद्धान्त के जनक कौन है।
प्रश्न 50 – कोहलर किस समप्रदाय के समर्थक थे।
प्रश्न 51– कोहलबर्ग का विकास सिद्धांत किससे संबंधित है।
प्रश्न 52 – ................ के अतिरिक्त बुद्धि के निम्नलिखित पक्षों को स्टर्नबर्ग के त्रितंत्र सिद्धांत में संबोधित किया गया है।
प्रश्न 53 – थ, फ, च ध्वनियॉं है।
प्रश्न 54 – बालकों की सोच अमूर्तता की अपेक्षा मूर्त अनुभवों एवं प्रत्ययों से होती है। यह अवस्था है-
प्रश्न 55– मानव विकास किन दोनों योगदान का परिणाम है।
प्रश्न 56 – निम्न में से कौन पियाजे के अनुसार बौद्धिक विकास का निर्धारक तत्व नही है।
प्रश्न 57 – समस्या के अर्थ को जानने की योग्यता,वातावरण के दोषों, कमियों एवं रिक्तियों के प्रति सजगता विशेषता है।
प्रश्न 58– एक क्रिकेट खिलाड़ी अपनी गेंदबाजी के कौशल को विकसित कर लेता है, पर यह उसके बल्लेबाली के कौशल को प्रभावित नही करता। इसे कहते है-
प्रश्न 59 – गिलफोर्ड ने ‘अभिसारी चिंतन’ पद का प्रयोग किसके समान अर्थ में किया जाता है।
प्रश्न 60 – व्यक्ति एवं बुद्धि में वंशानुक्रम की -
प्रश्न 61 – जिन इच्छाओं की पूर्ति नही होती, उनमें से भंडारगृह किसका है।
प्रश्न 62 – बालक के सामाजिक विकास में सबसे महत्वपूर्ण कारक कौन सा है।
प्रश्न 63 – लड़कियों में बाह्य परिवर्तन किस अवस्था में होने लगता है।
प्रश्न 64 – भाषा विकास के क्रम में अंतिम क्रम है-
प्रश्न 65 – विकासात्मक बालमनोविज्ञान का जनक किसे माना गया है।
प्रश्न 66 – संवेगात्मक स्थिरता का लक्षण है-
प्रश्न 67 – संवेग शब्द का शाब्दिक अर्थ है-
प्रश्न 68– लैमार्क ने अध्ययन किया था -
प्रश्न 69 – बालक के सामाजिकरण का प्रथम घटक है।
प्रश्न 70 – प्राकृतिक चयन के सिद्धांत का संबंध है।
प्रश्न 71 – अब शिक्षा हो गई है।
प्रश्न 72 – पैतृक गुणों के हस्तांतरण के सिद्धांतों को स्पष्ट किया था।
प्रश्न 73– ‘बालक की अभिबृद्धि जैवकीय नियमों के अनुसार होती है’ यह कथन है-
प्रश्न 74– बालविकास का अर्थ है।
प्रश्न 75– अधिगम का पुनरावृत्ति का सिद्धांत दिया है।
Tuesday, July 30, 2019
वृद्धि एवं विकास की परिभाषा तथा अंतर
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प्रस्तावना-
प्रत्येक व्यक्ति में शारीरिक मानसिक भावनात्मक और सामाजिक परिपेक्ष में पल-पल बदलाव आता है.
जन्म के समय बालक शिशु कहलाता है कुछ समय बाद बालक फिर किशोर वयस्क और एवं वृद्ध कहलाता है। प्रारंभिक अवस्था में वह अबोध कहलाता है, फिर शरारती गंभीर विद्वान ज्ञानी आदि विशेषताओं से युक्त हो जाता है। व्यक्ति की आयु में वृद्धि के साथ साथ उसके शारीरिक और मानसिक योग्यता क्षमताओं में भी वृद्धि होने लगती है इस कारण व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं व्यवहार में भी परिवर्तन होता रहता है। शिक्षा के क्षेत्र में बालक के व्यक्तित्व एवं व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। बालक के संपूर्ण व्यक्तित्व में परिवर्तन को अभिवृद्धि एवं विकास के नाम से जाना जाता है।
प्रत्येक व्यक्ति में शारीरिक मानसिक भावनात्मक और सामाजिक परिपेक्ष में पल-पल बदलाव आता है.
जन्म के समय बालक शिशु कहलाता है कुछ समय बाद बालक फिर किशोर वयस्क और एवं वृद्ध कहलाता है। प्रारंभिक अवस्था में वह अबोध कहलाता है, फिर शरारती गंभीर विद्वान ज्ञानी आदि विशेषताओं से युक्त हो जाता है। व्यक्ति की आयु में वृद्धि के साथ साथ उसके शारीरिक और मानसिक योग्यता क्षमताओं में भी वृद्धि होने लगती है इस कारण व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं व्यवहार में भी परिवर्तन होता रहता है। शिक्षा के क्षेत्र में बालक के व्यक्तित्व एवं व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। बालक के संपूर्ण व्यक्तित्व में परिवर्तन को अभिवृद्धि एवं विकास के नाम से जाना जाता है।
अभिवृद्धि-
अभिवृद्धि का सामान्य अर्थ होता है आगे बढ़ना बालक के वृद्धि के संबंध में इसे उसके शरीर के आंतरिक एवं बाह्य अंगों के आकार भार और इनकी कार्यक्षमता में होने वाली वृद्धि के रूप में देखा जाता है मानव शरीर में यह वृद्धि एक आयु तक (18- 20 ) वर्ष की ही होती है. उसके बाद अंगों में वृद्धि नहीं होती अर्थात इस आयु तक व्यक्ति पूर्ण वयस्क हो जाता है इस वृद्धि को देखा परखा जा सकता है। और इसका मापन भी किया जा सकता है।
मानव अभिवृद्धि से तात्पर्य उनके शरीर के बाह्य एवं आंतरिक अंगों के आकार भार एवं कार्य क्षमता में होने वाली वृद्धि से होता है जो उसके गर्भ समय को परिपक्वता प्राप्त करने तक चलती है।
अभिवृद्धि का सामान्य अर्थ होता है आगे बढ़ना बालक के वृद्धि के संबंध में इसे उसके शरीर के आंतरिक एवं बाह्य अंगों के आकार भार और इनकी कार्यक्षमता में होने वाली वृद्धि के रूप में देखा जाता है मानव शरीर में यह वृद्धि एक आयु तक (18- 20 ) वर्ष की ही होती है. उसके बाद अंगों में वृद्धि नहीं होती अर्थात इस आयु तक व्यक्ति पूर्ण वयस्क हो जाता है इस वृद्धि को देखा परखा जा सकता है। और इसका मापन भी किया जा सकता है।
मानव अभिवृद्धि से तात्पर्य उनके शरीर के बाह्य एवं आंतरिक अंगों के आकार भार एवं कार्य क्षमता में होने वाली वृद्धि से होता है जो उसके गर्भ समय को परिपक्वता प्राप्त करने तक चलती है।
विकास का अर्थ-
विकास एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो जन्म से लेकर के जीवन पर्यंत तक निरंतर चलती रहती है केवल शारीरिक वृद्धि की ओर ही संकेत नहीं करती अपितु इसके अंतर्गत हुए सभी शारीरिक मानसिक सामाजिक एवं संवेगात्मक परिवर्तन सम्मिलित रहते हैं जो गर्भ काल से लेकर के मृत्यु उपरांत तक निरंतर प्राणी में प्रकट होते रहते हैं।विकास में होने वाले सभी परिवर्तन सामान नहीं होते जीवन की प्रारंभिक अवस्था में होने वाले परिवर्तन रचनात्मक और परिवर्तन विनाशात्मक होते हैं रचनात्मक परिवर्तन प्राणी में परिपक्वता लाते हैं और विनाश आत्मक परिवर्तनों से वृद्धावस्था की ओर ले जाते हैं। विकाश एक व्यापक शब्द है। इसे परिवर्तनों की श्रंखला भी कहा जाता है इसके फलस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताओं का उदय होता है तथा पुरानी समस्याओ की समाप्ति हो जाती है। प्रौढ़ावस्था में पहुच कर मनुष्य स्वयं को जिन गुणों से संपन्न पाता है विकास की प्रक्रिया के ही परिणाम होते हैं।
विकास एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो जन्म से लेकर के जीवन पर्यंत तक निरंतर चलती रहती है केवल शारीरिक वृद्धि की ओर ही संकेत नहीं करती अपितु इसके अंतर्गत हुए सभी शारीरिक मानसिक सामाजिक एवं संवेगात्मक परिवर्तन सम्मिलित रहते हैं जो गर्भ काल से लेकर के मृत्यु उपरांत तक निरंतर प्राणी में प्रकट होते रहते हैं।विकास में होने वाले सभी परिवर्तन सामान नहीं होते जीवन की प्रारंभिक अवस्था में होने वाले परिवर्तन रचनात्मक और परिवर्तन विनाशात्मक होते हैं रचनात्मक परिवर्तन प्राणी में परिपक्वता लाते हैं और विनाश आत्मक परिवर्तनों से वृद्धावस्था की ओर ले जाते हैं। विकाश एक व्यापक शब्द है। इसे परिवर्तनों की श्रंखला भी कहा जाता है इसके फलस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताओं का उदय होता है तथा पुरानी समस्याओ की समाप्ति हो जाती है। प्रौढ़ावस्था में पहुच कर मनुष्य स्वयं को जिन गुणों से संपन्न पाता है विकास की प्रक्रिया के ही परिणाम होते हैं।
विकास की परिभाषा-
हरलॉक के अनुसार-
"विकास केवल अभिवृद्धि तक ही सीमित नहीं है वरन् वह व्यवस्थित तथा संगत परिवर्तन है जिसमें की प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम नहीं रहता है जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएं एवं योग्यताएं प्रकट होती हैं."
हरलॉक के अनुसार-
"विकास केवल अभिवृद्धि तक ही सीमित नहीं है वरन् वह व्यवस्थित तथा संगत परिवर्तन है जिसमें की प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम नहीं रहता है जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएं एवं योग्यताएं प्रकट होती हैं."
मुनरो के अनुसार -
“विकास परिवर्तन श्रंखला की वह अवस्था है जिसमें बच्चा प्रौढ़ावस्था से लेकर के पूर्ण अवस्था तक गुजरता है विकास कहलाता है.”
“विकास परिवर्तन श्रंखला की वह अवस्था है जिसमें बच्चा प्रौढ़ावस्था से लेकर के पूर्ण अवस्था तक गुजरता है विकास कहलाता है.”
वृद्धि एवं विकास में अंतर -
मुख्यतः वृद्धि एवं विकास का प्रयोग लोग पर्यावाची शब्द में करते हैैं लेकिन इन दोनों में काफी अंतर है जिसे हम निम्नलिखित रूप से देख सकते हैैं -
मुख्यतः वृद्धि एवं विकास का प्रयोग लोग पर्यावाची शब्द में करते हैैं लेकिन इन दोनों में काफी अंतर है जिसे हम निम्नलिखित रूप से देख सकते हैैं -
1.अर्थ के अधार पर-
वृद्धि का अर्थ है शारीरिक परिवर्तन। इन परिवर्तनो के कारण व्यवाहार मे परिवर्तन होने लगता है। लेकिन विकास का अर्थ गुणात्मक परिवर्तनो से किया जाता हैं। जैसे- बालक की कार्यकुशलता का विकास, उसकी कार्यक्षमता में विकास और व्यवहार में सुधार आदि।
वृद्धि का अर्थ है शारीरिक परिवर्तन। इन परिवर्तनो के कारण व्यवाहार मे परिवर्तन होने लगता है। लेकिन विकास का अर्थ गुणात्मक परिवर्तनो से किया जाता हैं। जैसे- बालक की कार्यकुशलता का विकास, उसकी कार्यक्षमता में विकास और व्यवहार में सुधार आदि।
2.व्यापक व संकुचित शब्द-
वृद्धि को विकास से संकुचित माना जाता है। क्योंकि वृद्धि की अवधारणा विकास की अवधारणा का ही एक भाग है।
वृद्धि को विकास से संकुचित माना जाता है। क्योंकि वृद्धि की अवधारणा विकास की अवधारणा का ही एक भाग है।
3.परिमाणात्मक और गुणात्मक-
वृद्धि का तात्पर्य मात्रात्मक या परिमाणात्मक परिवर्तनो से जबकि विकास का सम्बध गुणात्मक परिवर्तनों से होता है। जैसे- बालक में वृद्धि हो रही है इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि उसमे विकास भी हो रहा है। जबकि बालक में विकास के लिए वृद्धि आवश्यक नहीं है।
वृद्धि का तात्पर्य मात्रात्मक या परिमाणात्मक परिवर्तनो से जबकि विकास का सम्बध गुणात्मक परिवर्तनों से होता है। जैसे- बालक में वृद्धि हो रही है इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि उसमे विकास भी हो रहा है। जबकि बालक में विकास के लिए वृद्धि आवश्यक नहीं है।
4.वृद्धि और विकास की निरन्तरता-
वृद्धि लगातार नहीं चलती बल्कि शिशुकाल में तीव्र गति से और उसके बाद धीमी हो जाती है। लेकिन विकास की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है। वह रूकती नहीं है।
वृद्धि लगातार नहीं चलती बल्कि शिशुकाल में तीव्र गति से और उसके बाद धीमी हो जाती है। लेकिन विकास की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है। वह रूकती नहीं है।
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